Campus Corridor
जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय
मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़ेंगे लेकिन खेतों से लेकर शहरों तक की आँखें पथराई जा रही है। बादल बिना बरसे चले जा रहे हैं। यह समस्या साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। अंधाधुँध विकास के कारण हमने ही यह स्थिति उत्पन्न की है। बीते सालों के मुकाबले इस साल गर्मी का ताप अधिक रहा और आने वाले सालों की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि बीते दिनों को हम लौटा नहीं सकते लेकिन आने वाले दिनों को सुधार जरूर सकते हैं। राज्य में डॉ. मोहन सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान का आरंभ प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से शुरू किया था जो माह जून के आखिरी दिन थम गया। यह अभियान समाज को जागृत करने तथा नदियों, तालाबों, कुँओं और बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार और संरक्षण करना प्रमुख था। स्वाभाविक है कि सरकार अपना
टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते
सोनम और सिया के मामले को लेकर जवान लडक़ी का पिता जो मेरा दोस्त है, चिंता में डूबा हुआ है। उसे लगता है कि उसकी बेटी के हाथ पीले करने में अब सौ अड़चनें आएगी। टूटता भरोसा और दरकते रिश्ते का यह जीवंत उदाहरण है। दोस्त की बेटी उच्च शिक्षित है, संस्कारी है और आत्मनिर्भर है लेकिन जो सोनम-सिया कांड है, वह उसके भावी जिंदगी का रोड़ा बन रही है। यह एक कड़ुआ सच है और इस सच से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं,नामुमकीन है। जिन स्थितियों, परिस्थतियों मेंं सोनम के बाद सिया प्रकरण हुआ, जो हुआ, सो वो हुआ लेकिन रिश्तों के मध्य भरोसे की एक महीन लकीर टूट गई। इन दोनों के कारण पूरे समाज में निराशा फैल गई है। लोगों को भरोसा रिश्ते से उठने लगा, जबकि सच यह है कि ये दोनों मामले एक अपराधिक मामले हैं। अदालत इसका फैसला करेंगी। साफतौर पर इसका बहुसंख्य
19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस जागरूकता और सर्तकता से ही निदान संभव
16 साल की छात्रा सुनीता खेलना चाहती है लेकिन जल्दी थक जाने से उसका मन उदास रहता है। इसके बावजूद वह निराश नहीं है और डॉक्टर की सलाह मानकर फिलहाल पढ़ाई पर ध्यान दे रही है। वहीं 24 साल की संगीता का कहना था कि शादी के बाद मुझे पता चला कि मुझे सिकलसेल है। पहले तो डर लग गया था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने इसे समझना शुरू किया। गर्भावस्था के समय ज्यादा सावधानी रखनी पड़ी। परिवार का सहयोग मिला तो जीवन थोड़ा आसान हो गया। परेशान तो 18 के साल का रमेश भी है और उसे लगता था कि ऐसा क्या हुआ कि उसका किसी काम में मन नहीं लगता। शरीर में असहनीय दर्द होने लगा लेकिन डॉक्टर के परामर्श के बाद समय पर दवा लेने और लगातार पानी पीने से वह बेहतर महसूस कर रहा है। ये वो सारे लोग हैं जिन्हें सिकलसेल रोग ने घेर रखा है। (सभी
चाँदनी को आशीष और समाज को संदेश
सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी
कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता
कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता। वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है। एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने। लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है। आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं। 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था। जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे। उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है। साथ ही अन्य
बिटिया अब नहीं जाती है पीहर
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिग हुई है। बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए। पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी। क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है। कोसों का फासला खत्म सा हो गया है। जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू। न आने जाने की परेशानी और न साज समान की। अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं। उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है। कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं। पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते