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19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस जागरूकता और सर्तकता से ही निदान संभव
16 साल की छात्रा सुनीता खेलना चाहती है लेकिन जल्दी थक जाने से उसका मन उदास रहता है। इसके बावजूद वह निराश नहीं है और डॉक्टर की सलाह मानकर फिलहाल पढ़ाई पर ध्यान दे रही है। वहीं 24 साल की संगीता का कहना था कि शादी के बाद मुझे पता चला कि मुझे सिकलसेल है। पहले तो डर लग गया था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने इसे समझना शुरू किया। गर्भावस्था के समय ज्यादा सावधानी रखनी पड़ी। परिवार का सहयोग मिला तो जीवन थोड़ा आसान हो गया। परेशान तो 18 के साल का रमेश भी है और उसे लगता था कि ऐसा क्या हुआ कि उसका किसी काम में मन नहीं लगता। शरीर में असहनीय दर्द होने लगा लेकिन डॉक्टर के परामर्श के बाद समय पर दवा लेने और लगातार पानी पीने से वह बेहतर महसूस कर रहा है। ये वो सारे लोग हैं जिन्हें सिकलसेल रोग ने घेर रखा है। (सभी
चाँदनी को आशीष और समाज को संदेश
सरकार अंतिमजन के घर तभी जाती है, जब चुनाव हो, यह समाज की आमधारणा बन चुकी है और बहुत हद तक यही सत्य भी है लेकिन बिना चुनाव या किसी राजनीतिक लाभ के जब सरकार अंतिमजन के घर पहुँचती है तो खबर बन जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का एक प्रतिभावान बिटिया को आशीर्वाद देने के लिए उसके घर जाना एक अलहदा मामला बन जाता है। बहुतेरे होंंगे जो इसे राजनीतिक चश्मे से देख रहे होंगे लेकिन थोड़ी देर के लिए राजनीतिक चश्मा उतार लीजिए क्योंकि ऐसे अवसर बिरले ही जीवन में देखने को मिलते हैं। मुख्मंत्री डॉ. मोहन यादव विशाल अट्टालिका जिसे हम मंत्रालय अथवा वल्लभभवन संबोधित करते हैं, के सामने बसी भीमनगर (इसे झुग्गी बस्ती कहने में मुझे परहेज है) की संकरी गलियों से गुजर कर उस बच्ची के पास जा पहुँचते हैं जिसने हाल ही में कार्मस विषय की 12वीं कक्षा में टॉप किया है। अपनी
कुछ बात तो है उनमें, कोई यूँ ही मोदी नहीं हो जाता
कुछ बात तो है उनमें, कोइ यूँ ही नरेन्द्र मोदी नहीं कहलाता। वैसे भी भारतीय राजनीति में अलग-अलग समय में अलग-अलग मानक गढ़े जाते हैं और वह ऐतिहासिक हो जाता है। एक और राजनीतिक मानक गढ़ा है प्रधानमंत्री के रूप में नरेन्द्र मोदी ने। लगातार 12 वर्ष प्रधानमंत्री बने रहने का उनका यह नया कीर्तिमान है। आप चाहें जितना विरोध कर लें, आप चाहें जितनी आलोचना कर लें लेकिन कुछ बात तो उनमें है कि कई बार विरोधी भी कायल हो जाते हैं। 12 वर्ष पूर्व उनका अभिनंदन, स्वागत और उम्मीदों का साल था। जैसा होता है समय के साथ इस भाव में कहीं कमी दिखी तो चाहने वाले वैसे ही बने रहे। उनकी पहचान वैश्विक नेता के रूप में अपवाद स्वरूप बनी रही तो लगातार और बार-बार राज्यों के चुनावों में उनके नाम पर जीत इस बात की आश्वस्ति दिलाती रही कि ‘मोदी मैजिक’ कायम है। साथ ही अन्य
बिटिया अब नहीं जाती है पीहर
अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिग हुई है। बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए। पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी। क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है। कोसों का फासला खत्म सा हो गया है। जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू। न आने जाने की परेशानी और न साज समान की। अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं। उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है। कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं। पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते
जेन जी का नया एडीशन और कॉकरोच का ‘हिट’
2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’
प्रतिभा देखिए, जात, रोजगार नहीं
मध्यप्रदेश के गर्वनर आदिवासी बच्चों के सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए उपयोग किए जाने पर ऐतराज जाहिर कर रहे थे, उसी समय दूसरी तरफ समाज प्रतिभावान बच्चों की प्रतिभा को धर्म, जात और रोजगार से तौल रही थी। दोनों मामले अलग-अलग होते हुए भी एक मंच पर एकाकार होते दिख रहे थे। गर्वनर का ऐतराज वाजिब है तो इस कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी बच्चे की प्रतिभा इस बात से नहीं आंकी जा सकती है कि वह किस जाति, धर्म का है या उसके पिता का रोजगार क्या है। हमारे समाज में गरीब की कोई मदद नहीं करेगा लेकिन गरीबी को बाजार में बेचने जरूर चला जाएगा। यह मसला स्कूली बच्चों के टॉपर होने का हो, भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन को हो या फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल वो फिल्में जिनमें भारत की गरीबी और भूखे-नंगे समाज का विद्रूपता के साथ किया