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प्रतिभा देखिए, जात, रोजगार नहीं
मध्यप्रदेश के गर्वनर आदिवासी बच्चों के सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए उपयोग किए जाने पर ऐतराज जाहिर कर रहे थे, उसी समय दूसरी तरफ समाज प्रतिभावान बच्चों की प्रतिभा को धर्म, जात और रोजगार से तौल रही थी। दोनों मामले अलग-अलग होते हुए भी एक मंच पर एकाकार होते दिख रहे थे। गर्वनर का ऐतराज वाजिब है तो इस कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी बच्चे की प्रतिभा इस बात से नहीं आंकी जा सकती है कि वह किस जाति, धर्म का है या उसके पिता का रोजगार क्या है। हमारे समाज में गरीब की कोई मदद नहीं करेगा लेकिन गरीबी को बाजार में बेचने जरूर चला जाएगा। यह मसला स्कूली बच्चों के टॉपर होने का हो, भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन को हो या फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल वो फिल्में जिनमें भारत की गरीबी और भूखे-नंगे समाज का विद्रूपता के साथ किया
बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन
सक्सेना जी पीएचई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर हुए हैं। किसी समय उनकी तूती बोला करती थी लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में ना केवल वे अकेले हैं बल्कि वृद्धाश्रम का एक कोना उनका बसेरा बन गया है। कभी करोड़ों का मामला सुलटाने वाले अग्रवाल दंपति की कहानी भी यही है। गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे द्विवेदी दंपति भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी काबिलियत और अनुभवों से समाज रोशन होता था। उनके अपने बच्चे आज किसी मुकम्मल मुकाम पर हैं तो उनका ही सहारा था। जिन्हें आप माता-पिता कहते हैं, आज वृद्धाश्रम में बिसूर रहे हैं। निराश और हताश भी हैं। ये दो चार लोग नहीं बल्कि वृद्धजनों की पूरी टोली है। आपस में बतिया लेते हैं और वृद्धाश्रम के दरवाजे पर टकटकी लगाये देखते हैं कि कहीं बहू-बेटा तो लेने नहीं आए? पोता-पोती की
बहने से बिसराने तक की ‘गैस गाथा’
चालीस बरस पहले भोपाल की में ‘हवा में जहर’ घुल गया था। यह जहरीली हवा जिंदा बस्तियों में बहने लगी। इस जहरीली गैस को नाम दिया गया ‘मिक’ यानि मिथाइल आइसोसाइनेट और इसे गर्भाधारण किया था अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड ने। आँख, गला के जरिए शरीर के हर अंग में यह जहरीली हवा घुल गई। रात के घुप्प अँधेरे में घुली जहरीली गैस ने जैसे पूरी जिंदगी को जहरीला बना दिया। 2-3 दिसंबर की वह दरम्यानी भयावह रात जब एक-दूसरे को कुछ सूझ नहीं रहा था। आँखों के सामने अँधेरा, धडक़न रूक रही थी। जाड़े के दिनों में बिस्तरों में लुके-छिपे लोगों में अचानक बला की जान आ गई। एक शोर उठा पीछे से। भागो, जान बचाओ। गैस रिस गई है। जानलेवा गैस। पलक झपकते ही सैकड़ों लोग भागने लगे। एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते जान बचाने के लिए दौड़ पड़े। अपनी अपनी धडक़न बचाने की जद्दोजहद में रिश्ते बेमानी हो गए।
देहदान या अंगदान : मोक्ष और सम्मान साथ-साथ
दो दिन पहले हमारे परिवार के एक बुर्जुग की मृत्यु हो गई. मृत्यु प्रकृति की नियति है, यह होना ही था लेकिन वे मर कर भी अमर हो गए. जीते जी उन्होंने देहदान या अंगदान का निर्णय ले लिया था। इस बारे में परिजनों को चेता दिया था कि उनकी देह को आग में भस्म करने के बजाय अस्पताल को दान कर दिया जाए ताकि उनका शरीर किसी जरूरतमंद के काम आ सके. वे अकेले नहीं हैं. समय-समय पर अनेक लोग इस प्रकार देहदान या अंगदान कर स्वयं को जीवित कर लेते हैं. हमारे समक्ष महर्षि दधीची का उदाहरण है। पौराणिक कथा हम सबने सुना है कि महर्षि दधीची किस तरह अपनी अस्थियों का दान कर असुर वृत्रासुर को मारकर शांति का मार्ग प्रशस्त किया था। महर्षि दधीची पृथ्वीलोक के निवासी थे. असुर को मारने का समय नहीं रहा लेकिन देहदान या अंगदान कर ऐसे व्यक्तियों को जीवित रखने का
नवाचार का 70वाँ ‘विधान’
मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है। अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है। मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश
मेरी आवाज़ ही पहचान है
सडक़ से सरकार तक संचार के माध्यमों में अपने जन्म से लेकर अब तक भरोसेमंद साथी रेडियो रहा है। भारत की आजादी की ख़बर हो या दैनंदिनी गतिविधियों की पुख्ता और सही जानकारी रेडियो से ही मिल पाती है। एक समय हुआ करता था जब रेडियो का मतलब आकाशवाणी हुआ करता था लेकिन अब शहरी इलाकों में एफएम और गाँव-खेड़े के लिए सामुदायिक रेडियो प्रचलन में है। रेडियो एक नए अनुभव की तरह हमारे साथ-साथ चल रहा है। किसी समय रेडियो के लिए लायसेंस लेना होता था तो आज टेक्रालॉजी ने सारे मायने बदल दिए हैं और हथेलियों पर बंद मोबाइल फोन में आप अपना पसंदीदा रेडियो प्रोग्राम, गीत-संगीत सुन सकते हैं. हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस सेलिब्रेट किया जाता है तो इसके पीछे भी ठोस कारण है और वह है कि इस दिन 13 फरवरी, 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना हुई थी. संयुक्त राष्ट्र