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जिम्मेदार नागरिक बनने का वक्त

किसी भी किस्म का संकट हमेशा समाधान की ओर लेकर जाता है। और कोई भी संकट स्थायी नहीं होता है। हमारी पीढ़ी ने कोविड महामारी को झेला और अब अमेरिका-इजराइल और इराक के मध्य युद्ध से उपजे हालात से वैश्विक संकट से दो-चार हो रहा है।  यह संकट भी स्थायी नहीं हैं लेकिन हालांकि हालात जो हैं, वह इस बात की गवाही नहीं देते कि समस्या का अंत तुरंत होगा और इसके चलते अनेक किस्म के संकट से भारत समेत दुनिया के अनन्य देश जूझ रहे हैं. भारत के समक्ष इस समय सर्वाधिक संकट ईंधन का है। इसके चलते गैस और पेट्रोल की सप्लाई पर असर साफ दिख रहा है। भले ही अभी हाहाकार नहीं मचा हो, लेकिन जिस तरह से लोग पैनिक हो रहे हैं, हालात वैसे ही बन रहे हैं. इस युद्ध से जो परिस्थिति निर्मित हो रही है, वह किसी सरकार, राजनीतिक दल का नहीं अपितु राष्ट्र के संकट के रूप में देखा जाना चाहिए. सरकार तो अपने स्तर पर संकट से निपटने के लिए तैयारी कर रही है और उसकी कोशिश होगी कि ईंधन की आपूर्ति की निरंतरता बनी रहे. इस संकट इस बात की आपकी परीक्षा ले रहा है और शायद आगे इम्तहान का दौर जारी रह सकता है और इस स्थिति में आपकी असल परीक्षा होगी कि आप वास्तविक में कितने देशभक्त हैं और ऐसे विकट समय में राष्ट्र का साथ कैसे देते हैं. इस परीक्षा में खरे उतरते हैं, तब आप गर्व से कह सकते हैं कि हम सब भारतीय हैं. यह समय नीति-नियमों और सरकार के व्यवहार की समीक्षा का नहीं है बल्कि हम सब के एक हो जाने का है।

इस संदर्भ में मुझे अपने एक वरिष्ठ का कथन याद आता है जिसमें वे कहते हैं-सब सुविधा हो और आप कार्य का प्रदर्शन कर रहे हैं, यह बड़ी बात नहीं है बल्कि असुविधा में बेहतर कार्य का प्रदर्शन करना आपके कौशल को दिखाता है। लगभग यही स्थिति हम सबके समक्ष है।  जब तक ईंधन की आपूर्ति सामान्य थी और युद्ध जैसी कोई स्थिति निर्मित नहीं थी, तब हम राष्ट्रभक्त थे लेकिन अब जब संकट व्यक्ति नहीं, समूचे समाज पर है तो अब हमें राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने के लिए ना केवल खुद आना ही नहीं होगा बल्कि अन्य को प्रेरित भी करना होगा ताकि जल्द ही स्थिति सामान्य हो सके. युद्ध के पहले भी हम कोविड के संकट से जूझ चुके हैं और इस बड़े संकट महामारी से खुद को निकाल पाने में कामयाब रहे. कोविड हो या युद्ध, यह संकटकालीन स्थितियां हमें राष्ट्र के प्रति निहित जिम्मेदारी को पूर्ण करने के लिए प्रेरित करती हैं. हमारी एक बड़ी कमजोरी यह है कि हम जल्दी से ना केवल पैनिक हो जाते हैं बल्कि स्टोर करने की मानसिकता के दास बन जाते हैं. कोविड के समय भी हमने ऐसा ही किया था और अनेक जरूरतमंदों को हमारी इस मानसिकता से नुकसान भी हुआ था. वर्तमान में भी यही देखने को आ रहा है लोग गैस टंकी स्टोर करने में तुल गए हैं. किसी उपभोक्ता के घर में चार और पाँच गैस सिलेंडर है तो वह सबको भरकर रख लेना चाहता है जबकि जिनके घरों में जरूरत के लायक एक सिलेंडर है, उसे पहले मिलना चाहिए. जब हम वसुधैव कुटुंबकम की बात करते हैं, सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात करते हैं तो इस पर अमल करने का वक्त आता है तो हम क्यों नहीं करते हैं? यह यक्ष प्रश्र ऐसे संकटकालीन स्थिति में हमारे समक्ष खड़ा होता है।

इस तात्कालिक संकट में एकजुटता की जरूरत है और इसे हम स्थानीय स्तर पर ही सुलझा सकते हैं. मोहल्ले और चौपालों में आपसी समझदारी से बैठकी कर यह जान लें कि अपने मोहल्ले में कितने घर हैं और प्रत्येक घर को कितनी ईंधन की जरूरत है? फिर आपस में सुविधानुसार एक-दूसरे की सहायता करें. इससे समाज के पैनिक होने से बचा जा सकेगा और सरकार को व्यवस्था करने में सहायता मिलेगी. इसी तरह आवश्यक होने पर ही वाहनों का उपयोग करें और कोशिश करें कि पेट्रोल का खर्च कम से कम हो. कुछ लोग मानकर कर चल रहे हैं कि हमारे पास ईवी है तो हम चिंता क्यों करें? तो वे लोग जान लें कि ईवी के लिए आपको इलेक्ट्रीसिटी की जरूरत होती है और इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए भी अपरोक्ष रूप से ईंधन की जरूरत होती है। बेहतर होगा कि ईवी को भी सुरक्षित रखें और आपातकाल में जरूरतमंदों की मदद में उपयोग लाएं. इस तरह छोटे-छोटे उपाय से समाज में पैनिक नहीं फैलेगा बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर करने की दिशा में मदद मिलेगी. ऐसा हमने कोविड के दरम्यान देखा है।

सरकारों को चाहिए कि वे आपातकालीन सेवाओं को छोडक़र वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी लागू कर दे जिससे ईंधन की बड़ी मात्रा में बचत होगी. पर्यावरण को इसका लाभ मिलेगा ही और जीवन सहज हो जाएगा. वर्कफ्रॉम होम की पॉलिसी से लाभ यह होता है कि अनेक अकारण स्थापना खर्च में भी कटौती होती है। साथ ही जरूरत पड़ने पर व्यक्ति हर समय उपलब्ध होता है। कार्यालयीन समय का बंधन नहीं होता है, इसमें वह भी नहीं है। सरकार अपने स्तर पर व्यवस्था को सुचारू बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह संकट स्थायी नहीं है। समाज और सरकार साथ मिलकर चलेंगे तो स्थिति से निपटने में आसानी होगी. फिलहाल संकट बहुत भयावह नहीं है, लेकिन हमारा डर उसे भयावह बना रहा है। बहुत जल्द ही हम तनावमुक्त होंगे, लेकिन जो संकट है, वह सरकार का ही नहीं, समाज का है। एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से हमें डर के आगे जीत को सामने रखना होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)