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जल संवर्धन अभियान से आगे अब हमारी जवाबदारी का समय

मानसून आँख-मिचौली कर रहा है। लगता है कि बादल अब बरस पड़ेंगे की तब बरस पड़ेंगे लेकिन खेतों से लेकर शहरों तक की आँखें पथराई जा रही है। बादल बिना बरसे चले जा रहे हैं। यह समस्या साल-दर-साल बढ़ती चली जा रही है। अंधाधुँध विकास के कारण हमने ही यह स्थिति उत्पन्न की है। बीते सालों के मुकाबले इस साल गर्मी का ताप अधिक रहा और आने वाले सालों की कल्पना करना भी मुश्किल है। ऐसे में जरूरी है कि बीते दिनों को हम लौटा नहीं सकते लेकिन आने वाले दिनों को सुधार जरूर सकते हैं। राज्य में डॉ. मोहन सरकार ने जल गंगा संवर्धन अभियान का आरंभ प्रतिपदा (गुड़ी पड़वा) से शुरू किया था जो माह जून के आखिरी दिन थम गया। यह अभियान समाज को जागृत करने तथा नदियों, तालाबों, कुँओं और बावडिय़ों जैसे जल स्रोतों का पुनरुद्धार और संरक्षण करना प्रमुख था। स्वाभाविक है कि सरकार अपना काम कर रही है लेकिन समाज की हिस्सेदारी भी जरूरी है। सरकारी आंकड़ों को मानें तो यह अभियान ने सार्थकता प्रदान की है और मान लेना चाहिए कि आंकड़े हवा में जारी नहीं किए जाते हैं। लेकिन इससे आगे की बात यह है कि सरकार के इस अभियान में जिन जलस्रोतों को पुर्नजीवन दिया गया, उसे बचाने और संवारने का समय अब आ चुका है।

जल प्रकृति का अमूल्य उपहार है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी। मानव, पशु-पक्षी, वनस्पति तथा समस्त जीव-जगत का अस्तित्व जल पर निर्भर है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, पवित्रता और समृद्धि का प्रतीक माना गया है। किंतु बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण, जल स्रोतों का अंधाधुंध दोहन तथा जल प्रदूषण के कारण आज विश्व गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है। अनेक क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और नदियाँ, तालाब तथा झीलें सूखती जा रही हैं। यदि समय रहते जल संरक्षण के प्रभावी उपाय नहीं अपनाए गए, तो भविष्य में पीने योग्य जल की भारी कमी उत्पन्न हो सकती है। इसलिए जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का नैतिक और सामाजिक दायित्व है।

इस स्थिति में हमें जल गंगा संवर्धन अभियान के आगे अब चलने की जरूरत है। यह अभियान गर्मी के मौसम में शुरू हुआ और जल स्रोतों को स्वच्छ और साफ किया गया। अब इन जल स्रोतों को लबालब करने का समय आ गया है। मानूसन अभी भले ही हमसे आँख-मिचौली कर रहा है लेकिन जब बरसेगा तो हमें लबालब कर देगा, यह उम्मीद बेमानी नहीं है। ऐसे में हम सबका दायित्व बन जाता है कि बारिश की इन बूँदों को सहेज और संवार कर रखें। जल संरक्षण के अनेक उपाय बताये जाते हैं और आप हम में से अनेक लोग करते हैं और यही जल गंगा संवर्धन अभियान को सार्थकता प्रदान करेगा।

जल संरक्षण के लिए सरकार तो जो करती है और करेगी, हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक स्तर पर क्या कर सकते हैं, इस पर विचार और पहल करने की जरूरत है। सबसे पहले वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना चाहिए। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों तथा सार्वजनिक भवनों में वर्षा के जल को एकत्र कर भूजल पुनर्भरण किया जा सकता है। इससे भूजल स्तर में सुधार होता है और भविष्य के लिए जल उपलब्ध रहता है। इसी तरह वृक्षारोपण भी जल संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है। पेड़ वर्षा को आकर्षित करते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं तथा भूजल पुनर्भरण में सहायता करते हैं। इसलिए अधिक से अधिक पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना आवश्यक है। कुछ साथी इस दिशा में सक्रियता के साथ प्रयास कर रहे हैं और बारिश के पहले ही लोगों को अपने घरों और मोहल्ले में पौधे लगाने की सलाह दे रहे हैं। वर्षाकाल में पौध रोपण करने से इसका परिणाम सुखदायक होता है और थोड़े समय में यह पौध वृक्ष का स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

खेती किसानी करने वाले किसान भाईयों को भी कृषि क्षेत्र में सूक्ष्म सिंचाई पद्धतियों, जैसे ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर सिंचाई का उपयोग किया जाना चाहिए। इससे कम जल में अधिक सिंचाई संभव होती है और जल की बचत होती है। किसानों को कम पानी वाली फसलों को अपनाने तथा वैज्ञानिक खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। खेती के लिए पानी की जरूरत सबसे अधिक होती है और खेती ना हो पायी तो अनेक प्रकार के संकटों से समाज को जूझना पड़ सकता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जल का विवेकपूर्ण उपयोग किया जाए। आवश्यक है कि नल को अनावश्यक खुला न छोडऩा, रिसाव की तुरंत मरम्मत कराना, आवश्यकता के अनुसार ही जल का उपयोग करना तथा पानी की बर्बादी रोकना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। छोटी-छोटी सावधानियाँ प्रतिदिन हजारों लीटर जल बचा सकती हैं। हमें इस मानसिकता से बाहर आना होगा कि हर कार्य सरकार को करना चाहिए। यह ठीक है कि संसाधन जुटाने और समाज को जागरूक करने का कार्य सरकार करती है लेकिन इसे परिणाममूलक बनाने की जवाबदारी अंतत: समाज की होती है। गंगा जल संवर्धन अभियान के माध्यम से जलस्रोतों को पुर्नजीवित करने का कार्य सरकार ने कर दिया है लेकिन इनके लंबे और सुदीर्घ जीवन के लिए जल संरक्षण का कार्य हमें करना होगा। जल संरक्षण एक सामूहिक अभियान है, जिसमें समाज की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य है। प्रत्येक व्यक्ति को जल का महत्व समझना चाहिए और दूसरों को भी इसके प्रति जागरूक करना चाहिए। परिवार में बच्चों को बचपन से ही जल बचाने की आदत सिखानी चाहिए।

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मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध