16 साल की छात्रा सुनीता खेलना चाहती है लेकिन जल्दी थक जाने से उसका मन उदास रहता है। इसके बावजूद वह निराश नहीं है और डॉक्टर की सलाह मानकर फिलहाल पढ़ाई पर ध्यान दे रही है। वहीं 24 साल की संगीता का कहना था कि शादी के बाद मुझे पता चला कि मुझे सिकलसेल है। पहले तो डर लग गया था, लेकिन धीरे-धीरे मैंने इसे समझना शुरू किया। गर्भावस्था के समय ज्यादा सावधानी रखनी पड़ी। परिवार का सहयोग मिला तो जीवन थोड़ा आसान हो गया। परेशान तो 18 के साल का रमेश भी है और उसे लगता था कि ऐसा क्या हुआ कि उसका किसी काम में मन नहीं लगता। शरीर में असहनीय दर्द होने लगा लेकिन डॉक्टर के परामर्श के बाद समय पर दवा लेने और लगातार पानी पीने से वह बेहतर महसूस कर रहा है। ये वो सारे लोग हैं जिन्हें सिकलसेल रोग ने घेर रखा है। (सभी परिवर्तित नाम) बचपन से लेकर उम्रदराज होते लोगों में यह बीमारी पायी जाती है। यह ऐसी अदृश्य और गंभीर आनुवंशिक चुनौती है, जिसके बारे में आज भी समाज में जागरूकता की भारी कमी है। अक्सर लोग इसे सामान्य एनीमिया (खून की कमी) समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह एक जटिल वंशानुगत रक्त विकार है। 19 जून को विश्व सिकल सेल दिवस के रूप में यूनाइटेड नेशन ने 2008 में मान्यता दी थी। इसका उद्देश्य सिकल सेल रोग को एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में पहचान दिलाना और इसके प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस सिकल सेल रोग के बारे में लोगों को जागरूक करने, समय पर जांच और उपचार को बढ़ावा देने तथा रोग से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है।
यह बीमारी न केवल मरीज को शारीरिक और मानसिक रूप से तोड़ती है, बल्कि उनके परिवारों और पूरे समाज के आर्थिक-सामाजिक ढांचे को भी गहराई से प्रभावित करती है। भारत जैसे देश में, जहाँ की एक बड़ी आबादी आज भी ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में रहती है, इस बीमारी का सही समय पर निदान और प्रबंधन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बन चुका है। मध्यप्रदेश के शहडोल जिले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिकलसेल के खिलाफ अभियान की शुरूआत की थी। तय किया गया है कि आने वाले 2047 तक देश को सिकलसेल रोग मुक्त बनाया जाएगा।
यहां जान लेना जरूरी है कि सिकल सेल रोग आखिर है क्या? इस बारे में डॉक्टरों के अनुसार शरीर में रक्त का प्रवाह लाल रक्त कोशिकाओं के माध्यम से होता है। सामान्य स्थिति में ये कोशिकाएं गोल, चिकनी और लचीली होती हैं, जो ऑक्सीजन को फेफड़ों से शरीर के सभी अंगों तक आसानी से पहुँचाती हैं। गोल आकार के कारण ये खून की अत्यंत पतली नसों में भी बिना किसी रुकावट के तैरती रहती हैं। इसके विपरीत, सिकल सेल रोग से पीडि़त व्यक्ति के शरीर में ये कोशिकाएं कडक़, चिपचिपी और हँसिए के आकार की हो जाती हैं। आकार में आए इस दोषपूर्ण बदलाव के कारण शरीर में मुख्य रूप से दो बड़ी समस्याएं उत्पन्न होती हैं-रक्त प्रवाह में अवरोध, हँसिए के आकार की कडक़ कोशिकाएं लचीली नहीं होतीं। जब ये छोटी रक्त वाहिकाओं से गुजरती हैं, तो आपस में उलझकर नस को ब्लॉक कर देती हैं। इससे शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन और पोषण नहीं पहुँच पाता, जिससे असहनीय दर्द का दौरा पड़ता है। इसे चिकित्सकीय भाषा में ‘सिकल सेल क्राइसिस’ (स्द्बष्द्मद्यद्ग ष्टद्गद्यद्य ष्टह्म्द्बह्यद्बह्य) कहा जाता है। क्रोनिक एनीमिया (खून की कमी) एक सामान्य गोल लाल रक्त कोशिका का जीवनकाल लगभग 120 दिनों का होता है। वहीं, सिकल सेल वाली दोषपूर्ण कोशिकाएं इतनी कमजोर होती हैं कि वे मात्र 10 से 20 दिनों में ही टूटकर नष्ट हो जाती हैं। बोन मैरो (अस्थि मज्जा) इतनी तेजी से नई कोशिकाओं का निर्माण नहीं कर पाता, जिसके परिणामस्वरूप मरीज के शरीर में हमेशा खून की भारी कमी बनी रहती है।
बीमारी के प्रमुख लक्षण और प्रभावसिकल सेल के लक्षण बचपन में ही (लगभग 5 से 6 महीने की उम्र में) दिखाई देने लगते हैं। इसके पीडि़त को तीव्र और असहनीय दर्द इस बीमारी का सबसे भयानक रूप है। नसों में रुकावट के कारण हड्डियों, सीने, पीठ, हाथ और पैरों में अचानक तेज दर्द उठता है जो कई दिनों तक रह सकता है। रक्त प्रवाह बाधित होने से बच्चों के हाथों और पैरों की उंगलियों में दर्दनाक सूजन आ जाती है। सिकल सेल रोग शरीर की तिल्ली को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का मुख्य हिस्सा है। इस कारण मरीजों को निमोनिया और अन्य जानलेवा संक्रमण जल्दी पकड़ते हैं। निरंतर खून की कमी से मरीज हमेशा थका हुआ रहता है। लाल कोशिकाओं के तेजी से नष्ट होने के कारण आँखों में पीलापन (पीलिया) आ जाता है। पीडि़त बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास भी सामान्य बच्चों की तुलना में धीमा होता है।
यह भी कि सिकल सेल रोग केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि यह प्रभावित परिवारों को गहरे आर्थिक संकट में धकेल देता है। इस बीमारी के इलाज के लिए जीवनभर दवाइयां (जैसे हाइड्रोक्सीयूरिया), नियमित रक्त परीक्षण और बार-बार ब्लड ट्रांसफ्यूजन (रक्त चढ़ाने) की आवश्यकता होती है। कई बार ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए यह मासिक खर्च उनके बजट से बाहर होता है। मरीज की देखभाल के लिए परिवार के कमाऊ सदस्यों को अपनी मजदूरी या नौकरी छोडऩी पड़ती है। सिकल सेल आनुवंशिक होने के कारण, प्रभावित परिवारों के युवाओं को विवाह के बाजार में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि किसी महिला को यह बीमारी है, तो उसे अक्सर पारिवारिक और वैवाहिक उपेक्षा झेलनी पड़ती है।
आमतौर इस रोग के बारे में शिक्षित ना होने के कारण यह मान लिया जाता है कि सिकल सेल रोग छुआछूत से होता है, वास्तविकता यह है कि यह कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है। यह पूरी तरह से वंशानुगत रोग है। दो सिकल सेल पीडि़त विवाह करते हैं, तब होने वाली संतान में यह रोग होने के 25 फीसदी चांस होता है। मरीजों को भरपूर पानी पीना चाहिए (ताकि खून गाढ़ा न हो), संतुलित आहार लेना चाहिए और संक्रमण से बचने के लिए समय पर टीकाकरण करवाना चाहिए।
सिकलसेल रोग से निपटने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास किया जा रहा है। भारत सरकार ने इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए वर्ष 2047 तक देश से सिकल सेल एनीमिया के पूर्ण उन्मूलन का लक्ष्य रखा है। इसके तहत ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन’ चलाया जा रहा है, जिसमें करोड़ों लोगों की मुफ्त जांच कर उन्हें ‘सिकल सेल जेनेटिक स्टेटस कार्ड’ दिए जा रहे हैं ताकि विवाह से पहले जोखिम का पता लगाया जा सके।
सिकल सेल रोग के खिलाफ पूरे समाज की सोच में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाना होगा। इस बीमारी को रोकने का सबसे अचूक और सरल हथियार है—जागरूकता और विवाह पूर्व जांच। जैसे विवाह से पहले पारंपरिक जन्म-कुंडली का मिलान किया जाता है, वैसे ही अनिवार्य रूप से ‘सिकल सेल कुंडली’ (रक्त जांच रिपोर्ट) का मिलान किया जाना चाहिए। समाज को सिकल सेल के मरीजों के प्रति हीनभावना या भेदभाव त्यागकर संवेदनशीलता अपनानी होगी और प्रभावित परिवारों को सामाजिक सुरक्षा देनी होगी, तभी एक स्वस्थ और सिकल-सेल मुक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री मंगूभाई पटेल की सक्रियता सिकल सेल रोग के खिलाफ उल्लेखनीय है। सबकुछ सरकार के भरोसे छोडक़र सरकार की सहायता से बीमारियों पर रोकथाम के लिए आगे आने का संकल्प लेना होगा।