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नारी शक्ति वंदन अधिनियम से स्त्री समाज को मिलेगा अधिकार और सम्मान हर जनम मोहे बिटिया ही कीजो

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:’ यह मात्र श्लोक नहीं है बल्कि सनातनी परंपरा इस बात की साक्षी है कि हर युग में मातृशक्ति को पूरा सम्मान और अधिकार दिया जाता रहा है. जहाँ स्त्री का सम्मान होता है, उसे बराबरी का अधिकार दिया जाता है, वह घर, समाज और राष्ट्र पुष्पित-पल्लवित होता है. भारत वर्ष में हर युग में स्त्री को अधिकार और सम्मान दिया जाता रहा है किन्तु बीते दशकों में स्त्रियों को अधिकार और सम्मान के नाम पर छलावा किया जाता रहा है. योजना बनाने की घोषणा होती रही है और इसे कभी अमलीजामा नहीं पहनाया गया. स्त्री स्वयं को ठगा सा महसूस करती रही है. हालात अब बदलने लगे हैं. डेढ़ दशक में महिला कल्याण के लिए बातों और वायदों से ऊपर उठकर जमीनी स्तर पर उन्हें अधिकार और सम्मान दिया जा रहा है. हालिया सत्ता में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का केन्द्र सरकार का फैसला उन्हीं में से एक है. स्त्री सशक्तिकरण को इस फैसले से वास्तविक शक्ति मिलेगी क्योंकि सत्ता में भागीदारी से ही उसकी ताकत में इजाफा होता है. महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदृष्टि की सोच का परिणाम है. इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि केन्द्र सरकार के इस फैसले के इतर कोई भी राजनीतिक दल जाएगा क्योंकि यह सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय का संदेश देता है. इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि इस नए कानून को सर्वसम्म्ति से पारित किये जाने की पूरी संभावना है, बावजूद इसके कि किसी भी प्रकार की और देरी दुर्भाग्यपूर्ण होगी और भारत की महिलाओं के साथ घोर अन्याय होगा। महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव स्वतंत्र भारत का यह क्रांतिकारी पहल है. इससे ना केवल महिलाओं को अधिकार प्राप्त होगा बल्कि देश की राजनीति का आचार-व्यवहार भी बदलेगा. इस पहल की सबसे बड़ी बात यह है कि समाज अब तक स्त्रियों को लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा का दर्जा देकर उन्हें महिमामंडित करता रहा है। लेकिन अब वास्तव में यह स्वरूप व्यवहार में देखने को मिलेगा. यह बिल दोनों सदनों से पास होकर कानूनी रूप ले लेता है, तो यह दशकों में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे बड़ा ढांचागत बदलाव होगा, जो 2029 में देश को 273 महिला सांसद देगा।

महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव भारत का भविष्य तय करने वाला है. प्रतिदिन महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार, उनके साथ अन्याय और आर्थिक रूप से निर्बल बनाने की जो कुचक्र जारी है, उसे तोडऩे में यह सहायक होगा. इस प्रस्ताव के पूर्व समूची राजनीति दलों में महिलाओं की सहभागिता का आंकड़ा जाँचें तो स्थिति शर्मनाक दिखती है. पुरुष प्रधान समाज की जो धारणा है, वह पुष्ट करती है. यही नहीं, महिला सहभागिता का अवसर भी तभी दिया गया जब लगा कि उनकी सहभागिता से ही उनके राजनीतिक और आर्थिक उद्देश्य पूरे होंगे. पिछले डेढ़ दशक की विवेचना करें तो समाज इस बात के लिए राहत महसूस कर सकता है कि आहिस्ता-आहिस्ता स्त्रियों के पक्ष में अनेक ठोस कदम उठाये गए हैं. सबसे उल्लेखनीय पक्ष तो यही है कि मोदी सरकार का यह फैसला संप्रदाय या धर्म विशेष को लक्ष्य करके नहीं बल्कि भारतीय स्त्री समाज के पक्ष में लिया गया है. तीन तलाक जैसी कुप्रथा को समाप्त किया गया तो यह भारतीय स्त्री समाज के हक में ही है. आदिवासाी, दलित और पिछड़े वर्ग की स्त्रियों को सर्वशक्तिशाली पद पर निर्विकार भाव से बिठाया गया तो यह स्त्री सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण के रूप में आप देख सकते हैं. देश की राष्ट्रपति पद पर विदुषी मूर्मु का चयन किया गया. चाहते तो किसी सामान्य वर्ग की कुलीन स्त्री को अवसर दे सकते थे लेकिन ऐसा नहीं कर संदेश दिया गया कि सबका साथ, सबका विकास में समाज के अंतिम छोर पर बैठे प्रतिभावान स्त्री को अवसर देना है. मोदी जी उस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जो उनके शीर्ष नेतृत्व ने आरंभ किया था. स्मरण रहे कि मध्यप्रदेश के इतिहास में उमा भारती को मुख्यमंत्री निर्वाचित कर इस परंपराका श्रीगणेश किया गया. इसके पहले ऐसा साहस किसी सत्ताधारी दल ने नहीं किया. दो अन्य राज्यों में भी भाजपा ने महिला मुख्यमंत्री बनाने का कार्य किया. अन्य प्रभावशाली पदों पर महिलाओं को अधिकार सम्पन्न बनाकर उन्हें सम्मान दिया गया और हालिया प्रस्ताव इस सोच को विस्तार देता है।

ताजा प्रस्ताव के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि 2029 में लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव महिलाओं के लिए पूरे आरक्षण के साथ कराए जाते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और भी मजबूत और जीवंत बनेगा। उनका मानना है कि महिलाएं आज कई क्षेत्रों में बेहतरीन काम कर रही हैं, इसलिए विधायी संस्थाओं में उनकी भागीदारी बढ़ाना बेहद जरूरी है। यहाँ यह भी जान लेना उचित होगा कि महिलाओंं की सत्ता में भागीदारी का यह प्रस्ताव कैसे लागू किया जाएगा. महिला आरक्षण विधेयक जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम  संबोधित किया गया है, जिसके पारित होने से संसद में महिलाओं की भागीदारी 33 प्रतिशत सुनिश्चित हो जाएगी। उल्लेखनीय है कि 1996 में महिला आरक्षण विधेयक की जाँच करने वाली संयुक्त संसदीय समिति की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि ओबीसी के लिए आरक्षण की अनुमति देने के लिए संविधान में संशोधन होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की महिलाओं के लिए आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए. ज्ञात रहे कि 19 सितंबर 2023 को मोदी सरकार ने विशेष सत्र में इस विधेयक को 128वें संवैधानिक संशोधन विधेयक, 2023 के रूप में पेश किया था। अब नारी शक्ति वंदन अधिनियम लोकसभा से पारित होने के बाद दोबारा राज्यसभा में जाएगा।

इस अधिनियम के पारित होने पश्चात लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटें 131 में से 43 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. इन 43 सीटों को सदन में महिलाओं के लिए आरक्षित कुल सीटों के एक हिस्से के रूप में गिना जाएगा. महिलाओं के लिए आरक्षित 181 सीटों में से 138 ऐसी होंगी जिन पर किसी भी जाति की महिला को उम्मीदवार बनाया जा सकेगा यानी इन सीटों पर उम्मीदवार पुरुष नहीं हो सकते.

महिलाओंं को सत्ता में अधिकार देने के लिए वर्तमान व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के स्थान पर परिसीमन कर सीटें बढ़ायी जा रही हैं जिसमें भी सरकार की मानें तो रोटेशन पद्धति लागू होगी. वर्तमान में लोकसभा में 543 सीटें हैं. नए प्रस्ताव के तहत 50 प्रतिशत वृद्धि के बाद यह संख्या बढक़र लगभग 816 हो जाएगी. इन 816 सीटों में से एक तिहाई यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. सबसे खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए अब अगली जनगणना का इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि 2011 की जनगणना के आधार पर ही परिसीमन की प्रक्रिया पूरी की जाएगी. साल 2029 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह से इसी नए बिल और नई परिसीमन व्यवस्था के आधार पर लड़ा जाएगा।

मोदी सरकार की महिलाओं हक में लिये गए फैसले ऐतिहासिक रूप में याद किए जाएंगे. अपने डेढ़ दशक के कार्यकाल में महिलाओं की शक्ति में ही इजाफा नहीं हुआ अपितु उन्हें आर्थिक, राजनीतिक रूप से भी बराबरी का दर्जा हासिल हुआ है. कल तक जो बिटिया अपने जन्म पर निराश होकर कहती थी-‘अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो’, आज वही बिटिया अपने जन्म पर इतरा रही है और कह रही है कि ‘मोहे हर जनम बिटिया ही कीजो’. स्त्री सम्मान भारतीय समाज का शाश्वत सत्य है और घर, परिवार, समाज और राष्ट में जिन्होंने स्त्री सम्मान को दोयम दर्जा दिया, उसे भी समाज में सम्मान नहीं मिला है. स्त्री अधिकार और सम्मान का यह निर्णय किसी एक दल या व्यक्ति का नहीं, यह भारत वर्ष का है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)