|माफ कीजिए, प्रतिभा देखिए, जाति और रोजगार नहीं|भोपाल की बेटी ने रचा इतिहास|मध्यप्रदेश में खुलते स्त्रियों के लिए बंद कपाट|जिम्मेदार नागरिक बनने का वक्त|नारी शक्ति वंदन अधिनियम से स्त्री समाज को मिलेगा अधिकार और सम्मान हर जनम मोहे बिटिया ही कीजो|‘स्कूल चलें हम’, आओ हम सब भी चलें साथ बच्चों के|डॉ. दांडेकर भोज के कुलगुरु, दिल्ली के स्कूलों में राष्ट्रीय नीति पाठ्यक्रम और चाय पर शोध|साहित्यिक पुरस्कार से लेकर मीडिया और शिक्षा जगत की ताज़ा हलचल|शिक्षा और मीडिया जगत की ताज़ा अपडेट्स: विश्वविद्यालय नियुक्तियाँ, स्कॉलरशिप और अवसर|शोधवृत्ति, भाषा सीखने के अवसर और शिक्षा, साहित्य और समाज की महत्वपूर्ण अपडेट्स|मध्यप्रदेश की बड़ी खबरें: आकाशवाणी उज्जैन से BU A+ तक, नेशनल अवॉर्ड और नए बदलाव|इग्नू में पहली महिला कुलपति समेत शिक्षा और रोजगार की प्रमुख अपडेट्स|पत्रकारिता और जनसंपर्क क्षेत्र में नए अवसर और बदलाव|मीडिया इंडस्ट्री में नौकरी, फिल्मोत्सव, पुरस्कार और संस्थागत बदलावों की प्रमुख खबरें|एमसीयू में 9 साल बाद पीएचडी की वापसी, पीआईबी में युवाओं को मिलेगा मौका|स्टूडेंट्स के लिए सोशल मीडिया में अवसर, संजीव पहुँचे शिमला|पत्रकारिता जगत में हलचल: PRSI चुनाव, गोयनका अवार्ड की घोषणा, मीडिया में तबादले और MCU में भर्ती|कुलपति चयन से लेकर मीडिया हाउस में बदलाव तक, शिक्षा और पत्रकारिता में हलचल|नियुक्तियाँ : कुलपति, परीक्षा नियंत्रक आवेदन और नाट्य विद्यालय में नए निदेशक|आकाशवाणी, पीआईबी से ख़बर|कुलपति के दावेदार के लिए खुशखबरी

माफ कीजिए, प्रतिभा देखिए, जाति और रोजगार नहीं

हालिया स्कूली परीक्षा परिणाम में दूर-दराज गाँव और कस्बों के बच्चों के प्रदर्शन ने पूरे समाज को चकित कर दिया है। ये बच्चे सुविधाहीन गाँव और कस्बों से निकले मोती हैं और इनकी प्रतिभा की चमक से सुविधासम्पन्न समाज की आँखें चुंधिया रही है। खास बात ये है कि ये सारे विद्यार्थी सुविधासम्पन्न निजी स्कूलों से नहीं बल्कि सरकारी स्कूलों के हैं। निश्चित रूप से हम सबके लिए गौरव की बात है और इन प्रतिभाओं को देखकर यह भरोसा हो जाता है कि आने वाले समय में प्रायवेट स्कूलों से पालकों का भरोसा उठ जाएगा। हालांकि इस पूरे प्रसंग में मन को कचोटने वाली बात यह है कि चिंह-चिंह कर इस बात को रेखांकित किया गया है कि कौन प्रतिभाशाली बच्चा कौन जात का है या उसके पिता का रोजगार क्या है? क्या कभी किसी ने प्रायवेट स्कूल से निकलने वाली प्रतिभाओंं का आंकलन ऐसे कभी किया है? शायद नहीं। जब हम समावेशी समाज की परिकल्पना करते हैं तब यह चिंहाकित किया जाना उचित है?

यह समाज और सरकार के लिए गौरव की बात है कि अल्प सुविधाओं के बीच विद्यार्थी अपनी मेहनत और लगन से ऊँची उड़ान भर रहे हैं। खबरों को पढक़र मन व्यथित हो जाता है कि जब लिखा जा रहा है कि अमुक छोटा रोजगार करने वाला या अमुक छोटी नौकरी करने वाले का बच्चा मेरिट में आ गया। कहा जा सकता है कि यह दृृष्टि यह दिखाने और बताने के लिए है कि परिवार में व्याप्त अभावों में उसने प्रतिभा का प्रदर्शन किया लेकिन सम्यक रूप से देखें तो एक किस्म का विद्यार्थी और उसके परिवार का अपमान है। यही नहीं, उसकी जाति को लेकर भी विशेष रूप से उल्लेख किया जा रहा है। यह पहली पहली बार नहीं हो रहा है। बार-बार और लगातार यह दिखाने की कोशिश की जाती रही है। यही नहीं, आईएएस और आईपीएस परीक्षा पास करने वाली प्रतिभाओं को भी इसी तरह टारगेट किया जाता है। यह सब स्टंट इसलिए नहीं कि उनके साथ हमदर्दी है बल्कि इसलिए कि जो दिखता है, वह बिकता है कि मानसिकता के साथ। प्रतिभावान बच्चों के साथ यह सामाजिक न्याय की अवधारणा को ध्वस्त करता दिखता है।

एक सार्वजनिक प्रोग्राम में मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगूभाई पटेल ने ऐतराज जताया है कि आदिवासी समुदाय के बच्चों को सरकारी कार्यक्रमों में नृत्य कराने के लिए बुलाया जाता है। इन बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा के प्रति सरकार का अपनापन का रवैया नहीं है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं) मोबा. 9300469918