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नवाचार का 70वाँ ‘विधान’

मध्यप्रदेश की पहचान एक उत्सवी प्रदेश की रही है लेकिन वह नवाचार का प्रदेश भी रहा है। अनेक ऐसे मौके और प्रसंग आए हैं, जब मध्यप्रदेश का नवाचार देश के लिए आदर्श बना हुआ है। मध्यप्रदेश विधानसभा ने अपना 69वाँ स्थापना दिवस मनाकर अगले वर्ष में प्रवेश करने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र में यह देखने को मिला. मध्य प्रदेश विधानसभा में लगभग एक दशक बाद विशेष सत्र बुलाया जा रहा है। इससे पहले वर्ष 2015 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में विशेष सत्र आयोजित किया गया था। इसके अलावा वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के समय और 1997 में आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर भी विशेष सत्र बुलाया गया था। विधानसभा अध्यक्ष के नवाचार पहल के अंतर्गत यह आयोजन किया गया. हालाँकि इसके पूर्व हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करने की परम्परा का श्रीगणेश भी किया गया।

इस अवसर पर मध्यप्रदेश की स्थापना के साथ ही पंडित रविशंकर शुक्ल से लेकर वर्तमान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की समीक्षा की गई. इस उत्सवी बैठक मे खुले मन से सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों के कार्यों की प्रशंसा करते हुए इस बात से परहेज करने के बजाय सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की चर्चा की गई. इसे आप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सूत्र वाक्य ‘सबका साथ, सबका विकास’ की दृष्टि से भी निरपेक्ष होकर देख सकते हैं. मध्यप्रदेेश की यही विशेषता मध्यप्रदेश को अलग और उसे देश का ह्दयप्रदेश कहा जाता है। सामान्य दिनों में विधानसभा में जिस तरह सत्ता पक्ष और प्रतिपक्ष आमने-सामने होते हैं तो लगता है कि ये प्रतिद्वंदी हैं लेकिन वास्तविकता है कि दोनों ही सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष प्रदेश और जनता के हित में चर्चा करते हैं. एक सशक्त विपक्ष लालटेन की भाँति सरकार का पथ प्रदर्शक होता है लेकिन राजनीतिक सौम्यता हमारे अपने मध्यप्रदेश की धरोहर है और जो  विधानसभा में देखने को मिला।

सत्तर साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा का जब गठन हुआ था, तब प्रथम विधानसभा अध्यक्ष पंडित कुंजीलाल दुबे थे, जिन्होंने 1 नवंबर 1956 से 7 मार्च 1967 तक इस पद पर कार्य किया और मध्य प्रदेश के गठन के समय से लेकर शुरुआती तीन विधानसभाओं (1956-1957, 1957-1962, 1962-1967) के अध्यक्ष रहे। इनके पश्चात श्री काशीप्रसाद पाण्डे, श्री तेजलाल टेंभरे, श्री गुलशेर अहमद, श्री मुकुन्द सखाराम नेवालकर, श्री यज्ञदत्त शर्मा, श्री रामकिशोर शुक्ला, श्री राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, श्री बृजमोहन मिश्रा, श्रीयुत श्रीनिवास तिवारी, श्री ईश्वरदास रोहाणी, डॉ. सीतासरन शर्मा, श्री नर्मदा प्रसाद प्रजापति (एन. पी.), श्री गिरीश गौतम विधानसभा अध्यक्ष की आसंदी पर बने रहे. सभी ने अपने गुरुत्तर दायित्व का निर्वहन कर विधानसभा की मान्य परम्पराओं का पालन किया।

वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने सौम्य स्वभाव के लिए परिचित हैं. अनेक बार राज्य में मंत्री एवं अन्य उच्च पदों पर रहने वाले श्री तोमर के स्वभाव में नवाचार है। विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनके नवाचार की स्वाभाविक अपेक्षा होती है और उन्होंने प्रदेश की अपेक्षा को पूर्ण करने की पहल की. विधानसभा अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने के तुरंत बाद श्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि ‘मेरी कोशिश होगी कि मेरी निगाह और नजर हर सदस्य पर रहे। उसका जो हक है उसे मिल सके। इसके साथ ही उन्होंने नए सदस्यों को सीखने और अध्ययन करने की सलाह दी, वहीं पुराने सदस्यों को नसीहत देते हुए कहा कि वे ये न सोचें की वे सब कुछ सीख गए हैं। वे विद्यार्थी का भाव हमेशा रखें। उन्होंने कहा कि मेरे से पूर्व सभी अध्यक्षों ने अनेक मानदंड स्थापित किए हैं। परंपरा स्थापित की है। अपने-अपने कार्यकाल में अपने-अपने ढंग से सदन का गौरव बढ़े, इस बात का प्रयत्न किया गया है। अध्यक्ष के रूप में आप सब की निश्चित रूप से मुझसे भी ऐसी अपेक्षा है। मेरी ईमानदार कोशिश होगी कि मैं आपकी अपेक्षा के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन कर सकूं।

विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर की पहल पर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की जयंती पर मध्यप्रदेश विधानसभा के सेंट्रल हॉल में पुष्पाजंलि का आयोजन के साथ विधानसभा में दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई। विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि अब हर वर्ष प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्रियों और विधानसभा अध्यक्षों की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण किया जाएगा। पं. शुक्ल का जीवन हमें सेवा, समर्पण और विकास की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि 1 नवंबर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य का गठन हुआ। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल जी के जीवन और संघर्ष से हम सभी प्रेरणा लेते हैं। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि हम सभी को उनके बताए मार्ग पर चलने की शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यह नवाचार किया है।

करीब सात दशक के सफर में मध्यप्रदेश विधानसभा का लंबा अनुभव है। कई बार ऐतिहासिक अनुभवों से गुजरा तो कई बार खट्टे अनुभव भी हुए लेकिन मान्य परम्परा का हमेशा निर्वाह किया गया. 1956 में नए मध्यप्रदेश का गठन हुआ तो छत्तीसगढ़ अविभाज्य अंग था तो इसी विधानसभा में साल 2000 में मध्यप्रदेश का विभाजन हुआ और छत्तीसगढ़ राज्य बनाने की सहमति प्रदान की. तत्कालीन उप-नेता प्रतिपक्ष राकेश चतुर्वेदी 13वीं विधानसभा सत्र के दरम्यान ही कांग्रेस छोडक़र भाजपा के साथ हो लिए थे. उस समय उन्हें कांग्रेस की ओर से सत्तापक्ष को घेरने की जवाबदारी थी क्योंकि अविश्वास प्रस्ताव की ओर से चर्चा होनी थी. ऐसे कई प्रसंग है जिन्हें स्मरण किया जा सकता है।

विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर अपने कार्यकाल में नवाचार के लिए जाने जाएंगे. अभी तो विधानसभा में नवाचार का श्रीगणेश हुआ है। आगे भी अनेक प्रसंग पर चर्चा का अवसर मिलेगा. मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एवं विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेन्द्र सिंह तोमर की दलगत राजनीति से ऊपर उठकर उनकी कार्यशैली केवल मध्यप्रदेश के लिए नहीं अपितु समूचे देश के लिए नजीर बनेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)