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बेकार, बेकाम नहीं हैं हमारे वृद्धजन

सक्सेना जी पीएचई विभाग में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर हुए हैं। किसी समय उनकी तूती बोला करती थी लेकिन उम्र के आखिरी पड़ाव में ना केवल वे अकेले हैं बल्कि वृद्धाश्रम का एक कोना उनका बसेरा बन गया है। कभी करोड़ों का मामला सुलटाने वाले अग्रवाल दंपति की कहानी भी यही है। गणित और अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे द्विवेदी दंपति भी उम्र के आखिरी पड़ाव पर वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। ये वे लोग हैं जिनकी काबिलियत और अनुभवों से समाज रोशन होता था। उनके अपने बच्चे आज किसी मुकम्मल मुकाम पर हैं तो उनका ही सहारा था। जिन्हें आप माता-पिता कहते हैं, आज वृद्धाश्रम में बिसूर रहे हैं। निराश और हताश भी हैं। ये दो चार लोग नहीं बल्कि वृद्धजनों की पूरी टोली है। आपस में बतिया लेते हैं और वृद्धाश्रम के दरवाजे पर टकटकी लगाये देखते हैं कि कहीं बहू-बेटा तो लेने नहीं आए? पोता-पोती की सूरत याद कर हौले से मुस्करा देते हैं लेकिन गोद में उठाकर लाड़ ना कर पाने की हसरत उनके चेहरे पर मायूसी बनकर उभर आती है। यह कहानी घर-घर की होती जा रही है। थोड़ा पैसा, थोड़ा रसूख कमाने के साथ ही वृद्धजन बोझ बनने लगते हैं। और जल्द ही तलाश कर लेते हैं उनके लिए वृद्धाश्रम का कोई कोना। पहले पहल आना-जाना भी होता है लेकिन धीरे-धीरे वह भी भुला दिया जाता है। संस्कारों में रची-बसी भारतीय संस्कृति का यह दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय है। इन पर लिखते हुए मैं भी एक गलती कर रहा हूँ क्यों एक दिन वृद्धजन दिवस पर लिख रहा हूँ। क्यों साल में बार-बार इस बात का स्मरण नहीं कराता हूँ। सच है लेकिन यह दिन इसलिए चुना कि आज अंतरराष्ट्रीय दिवस वृद्धजन के बहाने लोग पढ़ तो लेेंगे। खास बात यह है कि हमारे वृद्धजन लिए नहीं बल्कि बाजार का दिन है। उम्र भर लतियाते वृद्धजनों का ऐसा सम्मान किया जाएगा कि लगेगा कि कुछ हुआ ही नहीं। इसी दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय की चर्चा कर रहा हूँ।

क्या ही हैरानी की बात है कि जिनसे हम रौशन हैं, जिनसे हमारा घर रौशन है, उनके लिए हमने एक दिन तय कर दिया है और नाम दे दिया है वृद्धजन दिवस। और इसका फलक बढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय कर दिया है। यूरोप की मानसिकता में वृद्धजन के लिए यह सौफीसदी मुफीद हो सकता है लेकिन भारतीय सनातनी संस्कृति में वृद्धजन बेकार और बेकाम नहीं हैं लेकिन दुर्र्भाग्य से हमने भी यूरोपियन संस्कृति का अंधानुकरण कर उन्हें बेकार और बेकाम मान लिया है। उम्र के आखिरी पड़ाव में ठहरे वृद्धजनों के पास अनुभव है, कौशल है और है दुनियादारी की वह समझ लेकिन वे निहायत अकेले होकर वृद्धाश्रम में अपना समय गुजार रहे हैं। कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हम सनातनी होने और संस्कार की दुहाई देते नहीं थकते और दूसरी ओर वृद्धजन की उपेक्षा और तिरस्कृत करने में पीछे नहीं हटते। आखिर क्या मजबूरी हो गई कि जिनकी छाँह में पलकर हम बढ़े हुए, वही हमारे लिए बोझ बन गए? क्यों हम उनके अनुभवों का लाभ लेकर जीवन को संवार नहीं पा रहे हैं? क्या कारण है कि उन्हें साथ रखते हुए कथित प्रायवेसी में बाधा आ रही है? सवाल अनेक हैं लेकिन सवालों के बीच अपने दुख और अहसास के बीच घुटते-घबराते वृद्धजनों की सुध कौन लेगा? क्या वृद्धाश्रम ही अंतिम विकल्प है।

वृद्धजनों को घर से बाहर निकाल देना, उनके साथ शारीरिक हिंसा करना और उन्हें अपमानित करने की खबरें अब रोजमर्रा की हो गई हैं। संवेदहीन होते समाज में वृद्धजन दिवस बाजार के लिए एक दिन है। वृद्धजनों को उत्पाद बना दिया जाएगा। दरअसल बाजार से बाहर आकर इन वृद्धजनों के टैलेंट का उपयोग करना होगा। परिवार के नालायक बच्चों ने वृद्धजनों को वृद्धाश्रम में भेज दिया है तो समाज का, सरकार का दायित्व है कि उन्हें मुख्यधारा में लाकर उनकी ना केवल प्रतिभा का सम्मान करे बल्कि उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का हौसला दे। देशभर के शासकीय स्कूलों की हालत एक जैसी है। शिक्षकों की कमी है तो इस कमी को इन वृद्धजनों से पूरा क्यों नहीं किया जा सकता है? इन्हें स्कूलों में अध्यापन का अवसर दिया जाए और बदलेे में सम्मानजनक मानदेय। ऐसा करने से उनके भीतर का खोया आत्मविश्वास लौटेगा। वे स्वयं को सुरक्षित और उपयोगी समझेंगे तो डॉक्टर और दवा से उनकी दूरी बन जाएगी। एक बेटे, पोते-पोती की कमी को दूर कर सकेंगे। स्कूली शिक्षा में गुणवत्ता आएगी। आखिरकार अनुभव अनमोल होता है।
कुछ वृद्धजन गणित, विज्ञान, हिन्दी, अंग्रेजी और अन्य विषयों के जानकार होंं लेकिन कुछ वृद्धजन ऐसे होंगे जो विषयों के सिद्धहस्त ना होंं लेकिन दूसरी विधा के जानकार हों, उन्हें कौशल विकास के कार्यों में नई पीढ़ी को दक्ष करने के कार्य में उपयोग किया जाना चाहिए। वृद्धाश्रम के भीतर ही कौशल उन्नयन की कक्षा आयोजित कर उत्सुक युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे सीख सकें। अध्यापन का कार्य हो या कौशल उन्नयन का। ज्यादा कुछ नहीं तो वृद्धाश्रम के भीतर ही हम विविध विषयों की साप्ताहिक कोचिंग कक्षा के संचालन की शुरूआत कर सकते हैं। जिसमें विषय की शिक्षा तो होगी ही, विविध कलाओं की कक्षाएं भी होंगी। जो जिस विधा में पारंगत है, वे उसमें सक्रिय हो जाएंगे। इन गतिविधियों में वृद्धजनों का जुड़ाव होगा तो वे वापस स्वस्थ्य और प्रसन्न हो जाएंगे। जिंदगी के प्रति उनका अनुराग बढ़ जाएगा। हौसला बढ़ेगा तो वे दवा से दूर हो जाएंगे।

बस, थोड़ा सा हमें उनके प्रति मेहनत करना है। थोड़ा सा साहस देना है। परिवार से टूटे लोग शरीर से ज्यादा मन से टूट जाते हैं और मन से टूटे को जोडऩा आसान नहीं होता लेकिन मुश्किल कुछ भी नहीं है। दो को खड़ा कीजिए, दस अन्य स्वयं सामने आ जाएंगे। इसमें जेंडर का कोई भेद नहीं हैं। वृद्धजनों का अर्थ माता और पिता दोनों ही हैं और दोनों ही अपने बच्चों से सताये हुए हैं। इस बार वृद्धजन दिवस पर हमें, हम सबको संकल्प लेना होगा कि अबकी बार वे वृद्धाश्रम में नहीं, कौशल की पाठशाला में रह रहे होंगे। वृद्धाश्रम को कौशल की पाठशाला में परिवर्तन ही भारतीय संस्कृति की ओर वापसी का पहला कदम होगा। नालायक बच्चों के लिए यह एक पाठ होगा कि उन्होंने कौन सा अनमोल हीरा गंवा दिया है। बाजार को अपना काम करने दीजिए, हम सब अपना काम करेंगे। एक बार कोशिश तो करके देखिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

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मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध