मध्यप्रदेश के गर्वनर आदिवासी बच्चों के सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन के लिए उपयोग किए जाने पर ऐतराज जाहिर कर रहे थे, उसी समय दूसरी तरफ समाज प्रतिभावान बच्चों की प्रतिभा को धर्म, जात और रोजगार से तौल रही थी। दोनों मामले अलग-अलग होते हुए भी एक मंच पर एकाकार होते दिख रहे थे। गर्वनर का ऐतराज वाजिब है तो इस कृत्य को जायज नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि किसी बच्चे की प्रतिभा इस बात से नहीं आंकी जा सकती है कि वह किस जाति, धर्म का है या उसके पिता का रोजगार क्या है। हमारे समाज में गरीब की कोई मदद नहीं करेगा लेकिन गरीबी को बाजार में बेचने जरूर चला जाएगा। यह मसला स्कूली बच्चों के टॉपर होने का हो, भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन को हो या फिर ऑस्कर की दौड़ में शामिल वो फिल्में जिनमें भारत की गरीबी और भूखे-नंगे समाज का विद्रूपता के साथ किया गया चित्रण हो। यह मसला बाजार में गरीबी बेचने को लेकर तो है ही, बल्कि अवचेतन में हमारे मस्तिष्क में बैठा वह सोच है जो यह सब करने के लिए प्रेरित करता है।
कोई अल्पशिक्षित अथवा गरीब परिवार सबकुछ दांव पर लगाकर अपने बच्चों को इसलिए ही पढ़ाता है कि वह इस जलालत भरी जिंदगी से बाहर निकल सके। बच्चा भी हाड़तोड़ मेहनत कर खुद की प्रतिभा और मेहनत कर स्वयं को साबित करता है। प्रतिभावान बच्चे के मन में अपने माता-पिता को सुखपूर्वक जिंदगी देने का सपना भी कहीं भीतर पल रहा होता है। ये वो प्रतिभावान बच्चे होते हैं जिनका कोई गॉडफादर नहीं होता है और ना ही इन्हें भौतिक सुविधायें मयस्सर होती हैं। अभावों और जुगाड़ के बीच किसी सरकारी स्कूल में पढक़र ये अपने सपने सच करने निकल पड़ते हैं। ऐसे में इन प्रतिभाओं का आंकलन इस तरह करने से ना केवल उनकी प्रतिभा को शर्मसार किया जाता है बल्कि उन पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी पड़ता है।
अब यहाँ प्रश्र उठता है कि प्रतिभावान बच्चों की गरीबी, जात-धर्म और रोजगार की गिनती कर उन्हें श्रेष्ठ बताने वाला समाज कभी उन रईसजादों और सुविधासम्पन्न बच्चों के बारे में बात करता है। क्या किसी समय किसी प्रभावशाली परिवार से उपलब्धि का शिखर छूने वाले बच्चे की जात-धर्म को पूछा गया या कि इसके पहले उनका परिवार कभी गरीबी में रहा तो उसका उल्लेख किया है। यही नहीं, लैंपपोस्ट के नीचे बैठकर सफलता का शिखर छूने वाला बच्चा समाज के लिए हीरो है तो एयरकंडीशन में सर्वसुविधायुक्त प्रायवेट स्कूल-कॉलेज में पढक़र निराश करने वाले बच्चों की स्टोरी की गई। शायद नहीं क्योंकि ऐसी स्टोरी बाजार का ‘माल’ नहीं है। गरीबी, जात-धर्म और रोजगार से टीआरपी हासिल होता है।
जब गर्वनर पब्लिक प्रोग्राम में आदिवासी बच्चों के प्रदर्शनकारी कलाओं के लिए सरकारी कार्यक्रमों में प्रदर्शन कर देखकर उखड़ जाते हैं तो यह भी उसी वर्ग में आता है जिसकी हम चर्चा कर रहे हैं। यहाँ भी आदिवासी बच्चों का उपयोग किया जाता है। यह समाज का सौभाग्य है कि मध्यप्रदेश को गार्जियन के रूप में एक ऐसे महामहिम मिले हैं जो हर वक्त आदिवासी समाज की चिंता करते हैं। यदा-कदा आदिवासी विकास के बजट का उपयोग नहीं करने पर भी उनका ऐतराज जायज है। यह शायद पहली-पहली बार हो रहा है कि जब महामहिम स्वयं ऐसे मामलों का संज्ञान ले रहे हैं। आदिवासियों के साथ समाज में तेजी से पैर पसार रहे सिकलसेल रोग को लेकर भी महामहिम चिंतित हैं। वे इसके खिलाफ लंबे समय से जागरूकता अभियान चलाकर जुटे हुए हैं। उनके इन प्रयासों का परिणाम है कि केन्द्र सरकार ने 2047 की मियाद तय की है जब समूचा समाज सिकलसेल जैसे अनुवांशिक रोग से मुक्त हो जाएगा। यह चर्चा तो महामहिम की सामाजिक सरोकार की चिंता पर है और इसी के बरक्स प्रतिभाओं के आंकलन पर चिंता करना जरूरी हो जाता है।
इस पूरे परिदृश्य में एक सुखद पक्ष यह भी उभर कर आता है कि जिन मेधावी विद्यार्थियों ने कामयाबी के शिखर छुए हैं, वे लगभग सभी सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यह तथ्य भी मिथ्या साबित हो जाता है कि सरकारी स्कूल में शिक्षा अच्छी नहीं है और बच्चों को वैसा मंच नहीं मिल पाता है, जैसा की सुविधासंपन्न निजी स्कूलों में। सरकार अपने तईं इन स्कूलों में वैसी ही शिक्षा देने का प्रयास कर रही है, जैसा कि मिथ निजी स्कूलों के बारे में बना हुआ है। सीएम राईज स्कूल बनाम सांदीपनी पाठशाला इसी मंतव्य को पूरा करते दिख रहे हैं। आंकड़ें बताते हैं कि निजी स्कूलों की भारी-भरकम फीस के चलते अब पालकों का मोह भंग हो रहा है और वे सरकारी स्कूल की तरफ लौट रहे हैं। मेधावी विद्यार्थियों की कामयाबी की खबर भी उनका भरोसा बढ़ाती है। सबकुछ होते हुए भी सरकारी स्कूल हों या अस्पताल, इनमें सुविधाओं की कमी नहीं है, कमी है तो विश्वास की। सरकारी व्यवस्था पर विश्वास लौटाने के लिए सरकार को विभिन्न स्तरों पर जतन करना पड़ेगा और इसका सबसे सुविधाजनक रास्ता है समाज को साथ लेकर चलना। सरकारी स्कूलों पर भरोसा तो लौट रहा है लेकिन गरीबी, रोजगार और धर्म-जाति से प्रतिभा को ना तौला जाएगा, इस बात के प्रति भी सर्तक रहना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)