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बिटिया अब नहीं जाती है पीहर

अभी अभी मेरी पत्नी अपने मोबाइल फोन से फारिग हुई है। बीस मिनट से ज्यादा हो गये होंगे बतियाते हुए। पूछने पर पता चला कि अपनी मम्मी से बातें कर रही थी। क्या खाया, क्या पकाया, कौन आया और कौन गया से लेकर वो सारी बातें जो महीनों बाद पीहर पहुंच कर कभी बिटिया अपनी अम्मां से करती थी, अब हर दिन बल्कि हर पहर हो रही है। कोसों का फासला खत्म सा हो गया है। जब मन किया, मोबाइल का बटन दबाया और सेकंड में बातों का सिलसिला शुरू। न आने जाने की परेशानी और न साज समान की। अब बीवियां पीहर जाने का नाम नहीं लेती हैं। उनका पीहर तो मोबाइल हो गया है। कभी पीहर जाने के लिये उतावली रहने वाली बीवियां अब नहीं जाने का बहाना ढूंढ़ती हैं। पतिदेव जिद करें कि कुछ दिनों के लिये पीहर हो आओ तो वे उन पर उलटे अहसान मढ़ते हुए कहेंगी आपके और बच्चों का रूटीन डिस्टर्ब हो जाता है, इसलिये वे नहीं जाना चाहतीं।

मोबाइल ने सुविधा तो दी है लेकिन कई चीजें खत्म भी कर दी है। किसी ब्याहता का पीहर जाना, केवल पीहर जाना नहीं होता था बल्कि इसके पीछे एक सामाजिक ताना-बाना होता था। पति-पत्नी के बीच की एकरसता को खत्म करने का यह एक अवसर होता था। रिश्तों की गर्माहट को महसूस करने का अवसर मिलता था। परिवार में ताजगी का अहसास होता था। इनके जाने और उनके नहीं रहने के बीच का फर्क महसूस होता था, यह फर्क अब नहीं रहा। एक मोबाइल ने जिंदगी की ताजगी को छीन लिया है। जब मोबाइल नहीं था तो बीवी के पास पीहर जाने का उत्साह होता था। उसे यह जान लेने की उत्सुकता होती थी कि उसकी गैरहाजिरी में अम्मां ने क्या क्या खरीदा है? ब्याहने के बाद अम्मां की मोहब्बत कम तो नहीं हुई, यह जांचने की कोशिश भी अनजाने में बिटिया करती थी। कदाचित अम्मां ने अपनी बहू के लिये बिटिया से कुछ अधिक खरीद लिया तो बिटिया तुनक कर कहती- हां, अब तो मैं परायी हो गयी हूं, अपनी बहू के लिये सब करेगी। बिटिया की इस मासूम शिकायत पर अम्मां न्यौछावर हो जाती। उसे मनाती और बताती कि ऐसा नहीं है।

रूठने और मनाने की इस गर्माहट को भी मोबाइल ने छीन लिया है। पीहर जाकर बिटिया अपने बचपन की यादों को टटोलती, संगी-सहेलियों के बारे में पूछती लेकिन अब मोबाइल इनका पता तो नहीं देगा? पीहर से लौटती बिटिया के आंखों में लरजते आंसू अम्मां को भी रूला जाते थे यह आंसू तब तक थमे रहते जब तक कि बिटिया वापस लौट आने की बात नहीं कहती। पीहर से ससुराल के रास्ते भी बहू के लौट जाने की प्रतीक्षा करते रहते। पतिदेव को अपनी पत्नी के लौट आने का बेसब्री से इंतजार रहता। जिस पत्नी से वह तंग आ चुका होता है, उसके नहीं रहने पर उसे तनहाई डसने लगती है। पत्नी के लौट आने पर पति थोड़ा नाराज दिखता है और पत्नी मनुहार करने बैठ जाती है। अपने घर के बिखर जाने का गम भी उसे रहता था। बात बात में पति और बच्चों को ताना कि उसके नहीं रहने पर घर की क्या हालत बना दी है।

रूठने, मनाने, शिकायत और प्रार्थना अब बीती जमाने की बातें रह गयी है क्योंकि बिटिया अब नहीं जाती है पीहर। महीनों बाद पीहर जाकर मां की खरीदी चीजें, बचपन की यादें और आने जाने वाले का ब्यौरा सुनने और सुनाने का काम भी इस मोबाइल ने खत्म कर दिया है। रोज मां से खबर मिल जाती है। क्या लिया और कितने में लिया, कौन आया, कौन गया और इधर से भी मां को रिपोर्ट हो जाती है कि आज सब्जी में क्या बना और कल की क्या प्लानिंग है। ब्याह के शुरूआती दिनों में पीहर छूट जाने का दुख होता है लेकिन समय गुजर जाने के बाद पति का घर प्यारा लगने लगता है। जो थोड़ी कसर इस मोबाइल से रह गयी थी, वह कसर इंटरनेट ने पूरी कर दी। कैमरे लगाया और पूरा पीहर अपने घर में बैठे घूूम लिया, देख लिया। मां की सूरत भी देख ली और पीहर की दीवारों का रंग भी जान लिया। बिटिया अब नहीं जाती है पीहर।

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मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध