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जेन जी का नया एडीशन और कॉकरोच का ‘हिट’

2014 को समाज नहीं भूला होगा और अब उनकी याद में 2026 भी दर्ज हो गया है। 2014 में ‘जेन जी’ का भारत में उदय हुआ था। भ्रष्टाचार और युवाओं के सपनों को लेकर अन्ना हजारे की अगुवाई में लाखों युवा सडक़ पर उतर आए थे। उम्मीद और भरोसे के साथ देश की राजधानी दिल्ली की सडक़ें युवाओं से पट गई थी। इसी समय चाय पर चर्चा करती भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया। केन्द्र की सरकार पर भाजपा इस ‘जेन जी’ के रास्ते सत्ता में काबिज हो गई तो केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने दिल्ली राज्य की सत्ता पर ‘जेन जी’ के सहारे बैठ गए। 2014 की पुनरावृत्ति सडक़ पर नहीं, सोशल मीडिया पर दिख रही है जब गुस्साये एक नौजवान ने ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से संगठन खड़ा कर दिया। हैरानी नहीं होना चाहिए बल्कि पड़ताल होना चाहिए कि ‘जेन जी’ इस समय कितना उबल रहा है और देखिए कि कुछ घंटों में हजारों से लाखों और लगभग इस समय तक करोड़ के आसपास युवा जुड़ गए हैं। 2014 के आंदोलन और आज के कॉकरोच जनता पार्टी के बीच कोई साम्य नहीं है लेकिन जेपी आंदोलन, अन्ना आंदोलन और आज के इस सोशल मीडिया आंदोलन में एक साम्य है, वह कि युवा जब घायल होता है तो वह संसार बदल डालता है। इसे आप कॉकरोच जनता पार्टी कहें या नेपाल के ‘जेन जी’ का नया एडीशन, युवाओं का गुस्सा उफान पर है।

कॉकरोच जनता पार्टी से जुडऩे का आह्वान भी अलग किस्म का है। यहाँ उसे सरकार बदलने या कथित बयान पर गुस्सा निकालने की कोई अपील नहीं किया गया बल्कि सीधे-सीधे उन लोगों से जुडऩे का अनुरोध किया गया जो बेरोजगार हों, आलसी हों और ज्यादतर ऑनलाइन रहते हों। यह अपील भी नाराजगी जाहिर करने का अपनी किस्म का शायद पहला हो लेकिन देखते ही देखते करोड़ों की संख्या में लोग जुडऩे लगे। सोशल मीडिया के महारथी भी इस तूफान से औचक और हैरान रह गए। उनकी सारी कोशिशें नाकाम हो गई और ‘कॉकरोच’ ने ऐसा ‘हिट’ मारा की सबके सब दुबक गए। पहले तो इस बात को समझ लें कि आखिर कॉकरोच जनता पार्टी का सोशल मीडिया एडीशन क्यों और कैसे खड़ा हुआ? कहा जाता है कि इस समूह का जन्म एक कथित टिप्पणी के विरोध से हुआ। यह भी स्पष्ट कर दें कि जिस टिप्पणी को लेकर युवा आक्रोशित हुआ है, उस टिप्पणी पर सफाई भी दी जा चुकी है। आमतौर पर देखा और समझा जा सकता है कि अनेक बार बयानों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाता है और सोशल मीडिया में ऐसे बयान को वायरल कर दिया जाता है। वायरल करने वाले का एकमात्र मकसद होता है अधिकाधिक धन अर्जन करना लेकिन दूसरी तरफ इस वायरल मैसेज से समाज में जो अराजकता उत्पन्न होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है, उसकी आहट सुनायी देने लगी है। भारत के इतिहास में यह पहला मौका नहीं है, अनेक बार ऐसी स्थिति आयी है किन्तु इस बार इसे सतही तौर पर लिया जाना थोड़ा खतरनाक हो सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव जितना बड़ा है, उसका बिजनेस मॉडल कहीं उससे ज्यादा बड़ा है। इस बात को भी जेहन में रखकर सोचना होगा।

2014 का अन्ना आंदोलन आज भी लोगों के जेहन में है और केन्द्र की सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा कारक इसे माना जाता है। यह आज के कॉकरोच जनता पार्टी की भाँति उदय ना होकर मुद्दा आधारित था। लोकपाल माँग के साथ अन्ना आंदोलन की स्क्रिप्ट लिखी गई थी।

जिस लोकपाल की माँग को लेकर आंदोलन खड़ा किया गया था, वह पूर्ण हुआ या नहीं, यह अलग विषय है। हालाँकि इसी आंदोलन से केजरीवाल ने ‘आप’ पार्टी को जन्म दिया। लोकप्रियता का आलम यह था कि लोकसभा में जलवा दिखाने वाली भाजपा को नाक के नीचे ‘जेन जी’ वाले केजरीवाल ने सत्ता से बाहर ही रखा। यह सब सुनियोजित नहीं था, जो हो रहा था, वह अप्रत्याशित था। लोगों के बीच संदेश गया कि जेपी आंदोलन के बाद देश में फिर एक बार परिवर्तन की लहर चल पड़ी है। दिल्ली की सत्ता में आप पार्टी ने कई प्रयोग किए लेकिन आखिरकार उनको भी मतदाताओं ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। लोकतंत्र में मतदाता भगवान होता है और वह चाहे जो निर्णय दे, वही मान्य होता है। पराजय के बाद आरोप-प्रत्यारोप स्वाभाविक है।

यहाँ यह बता देना सामयिक होगा कि जिन लोगों को जेपी आंदोलन याद है, जिन लोगों को अन्ना आंदोलन का स्मरण है, वे याद रखें कि संभवत: देश में ऐसी ही युवा आंदोलन से असम में पहली बार प्रफुल्ल मोहंता सरकार बनी थी। इसकी उम्र भी कोई दसेक साल की रही। सवाल यह है कि युवा जोश ठंडा पड़ गया या कि मतदाता जागरूक हो गए जिन्होंने तीसरी बार मोहंता को अवसर नहीं दिया। कुछ ऐसा ही मामला बंगाल से रूखसत की गई ममता बेनर्जी को दिखता है। ऐसे ही जोश-खरोश के साथ बंगाल के मतदाताओं ने टीएमसी को पंद्रह वर्षों तक सत्ता सौंपी थी लेकिन विकल्प मिलते ही उन्हें सरकार से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। फिर वही विलाप कि चुनाव में धांधली की गई। खैर, यह सब होता है और होता रहेगा।

अब सवाल आज की सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का है। युवा वेग उफान पर है लेकिन यक्ष प्रश्र यह है कि यह वेग कब तक रहेगा और किस दिशा में चलेगा? नाराजगी में बना कोई संगठन (फिलहाल कानूनी अस्तित्व नहीं) अक्सर रास्ता भटक जाता है। जिस तेजी से युवा लामबंद हो रहे हैं, वह बदलाव ला भी सकते हैं और खुद भी बदल सकते हैं। मिसाल के तौर पर नेपाल में जो कुछ हुआ, वह भारत में संभव नहीं है। युवा उम्र ही क्रांति का बीज बोती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है लेकिन क्रांति के लिए मुद्दाआधारित गुस्से की जरूरत होती है और ऐसे आंदोलन जेपी और अन्ना का इस देश ने देखा है। भारत में नए किस्म के ‘जेनजी’ को फिलवक्त कुछ राजनीतिक लोगों का समर्थन भी मिलता दिख रहा है। प्रतिपक्ष की राजनीति देशहित के लिए होता है और संभव है कि आगे भी इस नए-नवेले संगठन को कोई साथ मिलेगा क्योंकि लाभ की राजनीति भला कौन छोडऩा चाहेगा। यह भी ध्यान रखना होगा कि सोशल मीडिया का प्रभाव संचार के किसी भी अन्य माध्यमों से ज्यादा प्रभावी और व्यापक है। घड़ी के सेकंड के काँटें के साथ सोशल मीडिया में लिखी-बोली गई बातें दुनिया भर में फैल जाती हैं और यही सबकुछ अभी हो रहा है। किसी राजनीतिक पार्टी को अपना कुनबा बढ़ाने के लिए वर्षों लग जाते हैं, वहीं अल्प समय में खड़ी हुए संगठन में करोड़ लोगों का जुट जाना अस्वाभाविक है।आगे देखना दिलचस्प होगा कि कॉकरोच जनता पार्टी रील की तरह स्क्रॉल हो जाएगी या इसका जेपी-अन्ना आंदोलन जैसा कोई प्रभाव दिखेगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

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मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध