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टूटता भरोसा, दरकते रिश्ते

सोनम और सिया के मामले को लेकर जवान लडक़ी का पिता जो मेरा दोस्त है, चिंता में डूबा हुआ है। उसे लगता है कि उसकी बेटी के हाथ पीले करने में अब सौ अड़चनें आएगी। टूटता भरोसा और दरकते रिश्ते का यह जीवंत उदाहरण है। दोस्त की बेटी उच्च शिक्षित है, संस्कारी है और आत्मनिर्भर है लेकिन जो सोनम-सिया कांड है, वह उसके भावी जिंदगी का रोड़ा बन रही है। यह एक कड़ुआ सच है और इस सच से इंकार किया जाना मुश्किल ही नहीं,नामुमकीन है। जिन स्थितियों, परिस्थतियों मेंं सोनम के बाद सिया प्रकरण हुआ, जो हुआ, सो वो हुआ लेकिन रिश्तों के मध्य भरोसे की एक महीन लकीर टूट गई। इन दोनों के कारण पूरे समाज में निराशा फैल गई है। लोगों को भरोसा रिश्ते से उठने लगा, जबकि सच यह है कि ये दोनों मामले एक अपराधिक मामले हैं। अदालत इसका फैसला करेंगी। साफतौर पर इसका बहुसंख्य समाज से बहुत कुछ लेना-देना नही है। समाज में बहुत किस्म के अपराध होते हैं और इसमें एक यह भी है। लेकिन एक अपराध से इतर समाज का मनोविज्ञान कुछ और ही कहता है। मीडिया रिपोटर््स की मानें तो रिश्ता करने से पहले परिवार अब जासूसों की मदद लेने लगे हैं। वे तहकीकात कर इत्मीनान कर लेना चाहते हैं। यह भारतीय संस्कारों के प्रतिकूल है लेकिन स्थितियाँ ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है।

लौटते हैं मेरे उस दोस्त की चिंता पर। मैं उसकी बातों से इत्तेफाकर रखता हूँ लेकिन निराशावादी नहीं हूँ और उसे समझाता हूँ कि मध्यप्रदेश में आठ करोड़ से अधिक की आबादी है और कोई डेढ़ करोड़ परिवार होंगे। ऐसे में एक परिवार में होने वाली दुघर्टना को नजीर मान लेना उचित नहीं है। वह इस बात से सहमत है लेकिन उसका अगला सवाल होता है कि मान लो, इसी एक परिवार और हो जाए तब? कहने को तो यह कपोल-कल्पित बातें हैं लेकिन कोई मुक्कमल जवाब मेरे पास नहीं है। इसलिए भी नहीं कि विकास की तमाम संभावनाओं के बाद भी हम रूढि़वादी संस्कृति से मुक्ति नहीं पा सके हैं। भारतीय समाज का विवाह का ताना-बाना ऐसा है जो आमतौर पर हमें उत्साह से भर देता है। लेकिन बदलती-बिगड़ती व्यवस्था के कारण विवाह संस्था पर आँच आने लगी है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है कि ऐसा क्यों? थोड़े समय पहले सुपरिचित अभिनेत्री जया बच्चन ने अपनी नीतिन शादी नहीं करने की बात कही थी। और ऐसे ही गाहे-बगाहे शोध-सर्वेक्षणों में आ रहा है कि भविष्य में विवाह संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। हो सकता है कि ऐसा हो जाए लेकिन इसके पहले जया के बयान पर गौर करना जरूरी है। यह उनकी सोच नहीं, अनुभव हो सकता है। बरसों वैवाहिक जीवन गुजारने के बाद वे अपनी ही बच्ची को ऐसा सुझाव दें तो कहीं ना कहीं उनका अपना अनुभव सामने आता है। ईश्वर करे ऐसी सारी बातें खारिज हो जाएं लेकिन सोनम-सिया प्रकरण के चलते सोचना जरूरी हो जाता है।

भारतीय विवाह संस्था का ताना-बाना कितना बिखरेगा, यह तो भविष्य बताएगा लेकिन खरोंच अभी से आने लगी है और दिखने लगा है। लिव-इन-रिलेशनशिप जैसी प्रथा इसके मूल में है। कथित आजादी की आवाज के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप भारतीय समाज के ताना-बाना को छिन्न-भिन्न कर रही है। अनादिकाल से भारतीय समाज में विवाह संस्था का अस्तित्व है और हर सनातनी के लिए यह एक धर्म है, नैतिक दायित्व है। ऐसे अनेक परिवार मिल जाएँगे जिनके परिजनों में पच्चीस, पचास और पचहतरवीं शादी की सालगिरह मनायी जाती है। विवाह एक सामाजिक बंधन नहीं बल्कि यह सामाजिक रिश्तों को विस्तार देने की परंपरा है। सनातन में एक ही गोत्र में शादी करना वर्जित माना गया है तो इसके पीछे भी वैज्ञानिक सोच काम करती है। जब दो अलग परिवार मिलते हैं तो समाज में एक नए समूह का उदय होता है लेकिन निकट के रिश्तों में शादी होने से संबंधों का दायरा छोटा हो जाता है। इस पर भी विचार करने की जरूरत है। एक पिता के नाते मेरे दोस्त की चिंता जायज हो सकती है लेकिन तर्क की कसौटी पर देखें तो इतनी चिंता की बात नहीं है। सोनम-सिया के प्रकरण को महज एक अपराधिक कृत्य ही मानें और इसका फैसला कानून समय के साथ करेगा। जो दोषी होगा, उसे सजा मिलेगी लेकिन एक ही तराजू पर रखकर तौलने से सामाजिक ताना-बाना भरभरा कर गिर जाएगा। विवाह भारतीय समाज का संस्कार है, विधान है और एक जरूरी परंपरा। इसे ऐसी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। इस समय की सबसे बड़ी जरूरत है समाज के भरोसे को टूटने से बचाना और रिश्तों को मजबूती से जोडक़र रखना। भारतीय समाज में, सनातन प्रकृति में बहुत सारी चीजें दरक रही हैं लेकिन दरकते रिश्तों को बचाना भी हमारा दायित्व है। और इन सबके लिए जरूरी है स्वयं के ऊपर विश्वास बनाये रखना।

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मनोज कुमार

वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया शिक्षा से संबद्ध