वह साल 2015 था। इसी साल कुछ थोड़ा पहले अमृता-दिग्विजय की प्रेम-कहानी मीडिया में परवान चढ़ी हुई थी। मीडिया अपने आदत के अनुरूप उतावला हुआ जा रहा था। जैसा बातें बनती है, बननी शुरू हुई। आगे बात बढ़ती और गपशप आगे बढ़ता इसके पहले अमृता-दिग्विजय ने सार्वजनिक तौर पर अपने रिश्ते को कबूल कर लिया। यही नहीं, इसी साल वे तमिलनाडु के एक मंदिर में जीवनभर के लिए बंधन में बंध गए। मीडिया में गपशप खत्म हो गई। अमृता-दिग्विजय का नवीन दांपत्य जीवन आरंभ हो गया। फौरीतौर पर देखा जाए तो दोनों में कोई मेल नहीं था। तब 68 बरस के दिग्विजयसिंह और 44 बरस की अमृता सिंह। एक राजनीति के गूढ़-ज्ञानी और दूसरी मीडिया का चमकता चेहरा। हालाँकि इस रिश्ते में एक बात कॉमन थी, वह यह कि अमृता-दिग्विजय अपनी-अपनी तनहाई में जी रहे थे। दिग्विजयसिंह की धर्मपत्नी आशाजी का बीमारी उपरांत देहांत हो गया था और अमृता अपने पति आनंद प्रधान से आपसी सहमति से अलग हो गई थीं। दोनों साथ जीवन की आगे की यात्रा में निकल पड़े। आशंका जाहिर की गई कि अमृता ने यह शादी दिग्विजयसिंह की दौलत और रसूख के कारण की है लेकिन यह अमृता ने इस आशंका को भी निर्मूल साबित कर दिया यह कह कर कि दिग्विजय की संपत्ति उनके बच्चों के नाम ही रहेगी। यह पूर्व पीठीका जानना इसलिए जरूरी है कि भारतीय सनातन परंपरा है क्या और कैसे निभाया जाता है। 2025 से लगाकर 2026 के एक दशक से अधिक समय में अमृता-दिग्विजय ने दो बड़ी यात्रा कर चुके हैं और इस समय वे तीसरी यात्रा पर हैं।
सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा की चर्चा इन दिनों राजनीतिक-गैर-राजनीतिक मंचों पर हो रही है। इसके पहले नर्मदा परिक्रमा और भारत जोड़ो यात्रा दिग्विजयसिंह पूरी कर चुके हैं। दिग्विजयसिंह हर यात्रा के नायक होते हैं और यह स्वाभाविक भी है। यह उनका संकल्प होता है और वे यात्रा पर निकल पड़ते हैं। उनका यह संकल्प, यह यात्रा अधूरी रहती, अगर उनके साथ उनकी सहधर्मिणी अमृता सिंह कंधे से कंधा मिलाकर साथ नहीं होतीं। अमृता सिंह उस सनातन परंपरा को निभा रही हैं जिसमें उल्लेखित है कि बिना जोड़े से ना कोई पूजा पूर्ण होती है और ना कोई संकल्प मूर्त रूप लेता है। भारतीय समाज में रिश्तों की यही खूबसूरती है कि वे किसी भी परिस्थिति में एक हों लेकिन जब एक हो जाते हैं तब वे रिश्ते को शिद्दत से जीते हैं। विवाह के पश्चात अमृता-दिग्विजय की यह तीसरी यात्रा है। इस यात्रा का सबसे मोहक पल तो वह रहा कि जब यात्रा के दरम्यान भारतीय स्त्री के लिए जरूरी पर्व ‘करवा चौथ’ आ गया। एक भारतीय पत्नी की मानिंद उपवास रखा, पति की सूरत परंपरानुसार चलनी में देखा, पति ने जल पिलाकर उपवास तुड़वाया और अमृता-दिग्विजय आगे की यात्रा पर चल पड़े। इस कहानी को राजनीतिक चश्मे से देखेंगे तो कई अर्थ निकलेंगे लेकिन इसे सहज भाव से पढ़ेंगे तो यह अलहदा लगेगा।
दिग्विजयसिंह के साथ ब्याह उपरांत कतिपय सार्वजनिक आयोजनों में अमृता-दिग्विजय आमंत्रित किए जाने लगीं। एक कोई प्रोग्राम भोपाल के रवीन्द्र भवन में भी था। वे वहाँ पहुँचीं लेकिन ना तो मंच पर गईं और ना ही प्रथम पंक्ति में बैठने लिए कोई उपक्रम किया। यह संयोग था कि ठीक उनके पीछे की पंक्ति में मैं भी बैठा था। स्वाभाविक था कि मेरे भीतर का पत्रकार सक्रिय हो गया। प्रोग्राम एक तरफ, अब मेरा सारा ध्यान उन पर था। मैं हतप्रभ था कि कभी आधुनिक पोशाक पहनकर टेलीविजन चैनल में सक्रिय रहने वाली अमृता पूरे संस्कार के साथ कोई डेढ़ घंटे के प्रोग्राम में भारतीय परिधान साड़ी में उपस्थित रहीं। सबसे खास बात यह है कि उनके सिर का पल्लू एक पल के लिए इधर-उधर नहीं हुआ। मुझे यह सब रोमांचित कर गया। यह लिखना उस समय भी चाहता था लेकिन टलता रहा और जब वे अमृता-दिग्विजय बनकर उनकी सहयात्री हैं तो लिखना जरूरी लगा। जरूरी इसलिए भी कि इस यात्रा मेें उनकी चर्चा नाममात्र के लिए हो रही है। वो मीडिया जो उनके प्रेम को लेकर उत्साहित था, क्या उसका दायित्व नहीं है कि वे इस भारतीय सनातनी दंपति से भी समाज को परिचित कराएँ? शायद नहीं क्योंकि इसमें वो टीआरपी ना मिले। खैर,
कितना भला-भला सा लगता है कि ना कि अपने जीवनसाथी दिग्विजय सिंह से 24 वर्ष कम उम्र की सुकोमल स्त्री जब अपना धर्म निभाते हुए 3300 किलोमीटर पाँव-पाँव नाप लेती हैं तो सनातन परंपरा को समृद्ध करती हैं। उम्र का फासला केवल गणित का विषय रह जाता है और जीवनसाथी का साथ सर्वोपरि हो जाता है। इसके बाद वे वर्ष 2022-23 में राहुल गांधी के नेतृत्व में निकली भारत जोड़ो यात्रा जिसके मुख्य संयोजक दिग्विजयसिंह थे तो फिर अमृता उनके साथ कन्याकुमारी से कश्मीर तक की राष्ट्रव्यापी पैदल यात्रा पर निकल पड़ती हंै। अब वे सत्य सनातन स्वाभिमान यात्रा पर अपने जीवन-साथी दिग्विजसिंह के साथ कदमताल कर रही हैं। अमृृता का मूल स्वभाव एक पत्रकार और लेखक का है तो वे अपने गुण-धर्म का निर्वाह करते हुए अनुभवों का दस्तावेजीकरण भी करती हैं। लगातर तीसरी यात्रा में चल रहीं अमृता की साहस की दाद समाज दे सकता है लेकिन साहस से कहीं अधिक संकल्प और धर्मनिष्ठा माना जाना चाहिए।
अनेक असफल प्रेम कहानी समाज सुनता रहा है लेकिन अमृता-दिग्विजय की कहानी ना केवल कामयाब है बल्कि समाज के लिए एक उदाहरण भी है। यह खासतौर इसलिए भी स्मरण रखना चाहिए कि जब आज के समय में जिस तरह रिश्ते बिखर रहे हैं। अविश्वास का भाव बढ़ता जा रहा है। इस काले समय में विश्वास जगाता है
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)